Sunday, 17 March 2013

मैं शरीर हूं!



मैं असुरक्षित महसूस करती हूं, जब मोटापे पर चर्चा होती है। भरी गर्मी में सफर के दौरान भी मैं वही कपड़े चुनती हूं जो औरों की आंखों को आरामदायक लगें। अगर मेरा रंग खिलता हुआ और शरीर इकहरा है तो मुझे सुरक्षा की जरूरत है और दबा हुआ है तो फेयरनेस क्रीम की। मैं अकेली नहीं हूं, जो अपने 'लुक्स" को लेकर सोचने को विवश की गई हूं। मेरा शरीर ही मेरी पहचान है।
दृश्य1- दफ्तर में हाल में आई युवा सहकर्मी सबसे हंसती-बोलती है। वो अपने बाल अक्सर खुले छोड़ देती है। चुस्त कपड़ों और ग्लॉसी लिपस्टिक की शौकीन है। लंचटाइम में किसी का भी खाने का न्यौता अस्वीकार नहीं करती।
पहला इंप्रेशन-
एक पुरुष की नजर से- लड़की फॉरवर्ड है, कोशिश की जा सकती है!
एक महिला की नजर से- देख लेना, किसी दिन फंसेगी।
दृश्य2- वो आपके पड़ोस में बसती है। बहुत कम बोलती-चालती है। लंबे बालों की सादी चोटी गूंथती है और एक छोटी सी बिंदिया माथे पर सजाए रखती है। उसे फोन पर खिलखिलाते या किसी भी एक्सट्रीम भावना में आपने कभी नहीं देखा।
पहला इंप्रेशन-
एक पुरुष की नजर से- थोड़ी 'ठंडी" तो है लेकिन शादी-वाला मटेरियल है।
एक महिला की नजर से- बेचारी, लगता है प्यार में धोखा खाया है।
दृश्य3- रात 11 के लगभग बस-स्टॉप पर एक लड़की खड़ी हुई है। वो बार-बार घड़ी को ओर देखती है। मोबाइल चेक करती है। उसके चेहरे पर घबराहट है। गाड़ी में किसी कपल का होना सुनिश्चत करके वो लिफ्ट मांगती है।
पहला इंप्रेशन-
दो जोड़ी नजरें- लफड़ेवाली लड़की हो सकती है। अपन तो अवॉइड करते हैं।
ईजी, कोल्ड, स्पाइसी, वाइल्ड... इस तरह से जाने कितने ही संबोधन महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। इसके लिए किसी महिला को किसी खास प्रतिभा की जरूरत नहीं। वो कैसी दिखती हैं, कैसे बोलती हैं, कैसे कपड़े पहनती हैं और यहां तक कि उनका रंग और आर्थिक परिवेश भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकता है। बहुतों बार ऑड समय भी स्त्री को किसी खास इमेज में कैद कर देता है, भले ही वो जरूरत की मारी हो। इस मामले में सारी दुनिया की स्त्रियों का हाल कमोबेश एक सा है। एक्टिविस्ट जैकलीन फ्रायडमैन की किताब के कुछ अध्याय भी इसी ओर इशारा करते हैं। 'व्हाट यू रीयली-रीयली वॉन्ट..." नामक किताब में वे एक कुंआरी युवती की कल्पना करने को कहती हैं। दिमाग की आंखों में सबसे पहली तस्वीर उभरती है एक ऐसी युवती की, जिसका रंग गोरा और बाल लंबे हैं। हालांकि किताब नस्ली रंगों के आधार पर स्त्री की छवि के बारे में है जो बताती है कि किस तरह रंग के आधार पर पुरुष दुनिभाभर की स्त्रियों को 'उपलब्ध" या 'कठिन" मान पाते हैं।
परियों की कहानियों में अच्छी लड़की का खूबसूरत होना उसकी बाध्यता रही और बुरी औरत का बदसूरत होना उसकी नियति। बुरा पुरुष खूबसूरत भी हो सकता है लेकिन स्त्रियों के मामले में हम हमेशा से 'बायस फॉर ब्यूटी" रहे। ऐसे शोधों की कतार है, जो बताते हैं कि किस तरह किसी महिला के लुक्स उसके सामाजिक जीवन और सफलता को प्रभावित करते हैं। दफ्तरों में भी साक्षात्कार में कमोबेश समान प्रतिभा वाली दो महिलाओं में से उसे चुना जाता है, जो अपेक्षाकृत आकर्षक है। हालांकि इसके अपने नुकसान हैं। आगे चलकर न सिर्फ उसपर अपने लुक्स मेंटेन रखने का दबाव रहता है, बल्कि कई बार वो सौंदर्य के चलते चारित्रिक दोष की तोहमत भी झेलती है।
शहरी के अलावा ग्रामीण परिवेश भी इससे अलहदा नहीं। एक परिचित अपना अनुभव शेयर कर रही थी। मेट्रोपॉलिटन में पली-बढ़ी उसकी बेटी का विवाह के बाद अपने ससुराल जाना हुआ। गांव में रहने का ये उसका पहला अनुभव था। बहूभेंट करने आ रहे मुलाकातियों में से एक स्त्री ने बिटिया की जेठानी की ओर इंगित करते हुए कहा- 'बड़ी बहू, अब तुम्हारी कीमत तो दो टके की रह गई, नईकी का रंग इतना 'उज्जर" जो है।" मेरी परिचिता ने गहरी सांस भरते हुए आगे जोड़ा, मिनटभर में रंग के आधार पर इंसान को जज करने वालों के साथ बिटिया का निबाह जाने कैसे होगा।
जीरो फिगर की चाहे जितनी आलोचना हो, इन दिनों छोटी-छोटी बच्चियां भी डाइट करती दिख सकती हैं। 11 साल की बच्चियां डाइट पर हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वे परफेक्ट नहीं। मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि कस्बे से भी ऐसे केस आ रहे हैं जिसमें लड़कियों खुद को दूसरों की नजरों से देखने के कारण डाइटिंग करने लगीं। एक बच्ची ने डाइनिंग टेबल पर खुलासा किया कि वो 'डाउन" महसूस करती है क्योंकि वो हर तरह के कपड़े नहीं पहन पाती और सहपाठी उसे 'सिड़ी" कहते हैं। बदलाव की बयार के तौर पर अब 'प्लस साइज" मॉडल भी आ रही हैं, हालांकि ऐसे मामले सीमित हैं।
'शारीरिक संशोधन" उन महिलाओं की जिंदगी का हम हिस्सा हो गया है, जो एस्थेटिक सर्जरी अफोर्ड कर सकती हैं। देश-दुनिया में तेजी से बढ़ रही कॉस्मेटिक सर्जरी का बाजार इसी ओर इशारा करता है। वर्जिनिया ब्लम अपनी किताब 'फ्लैश वाउंड्स: द कल्चर ऑफ कॉस्मेटिक सर्जरी" में संकेत देती हैं कि महिलाओं को इस कदर शरीर बना दिया गया है कि वे इसमें करेक्शन को ही जिंदगी मानने लगी हैं। 19वीं सदी में भी ब्रेस्ट का सौंदर्य बढ़ाने के लिए महिलाएं खुरदुरे तौलिए से खुद को इतना रगड़ती थीं कि रक्तरंजित हो जातीं। लेखिका कहती हैं कि 'कॉस्मेटिक" पार्ट का इतना प्रचार किया गया कि 'सर्जरी" पार्ट अनदेखा ही रह गया, जबकि इसके चलते कई बार महिलाओं को जीवनभर का दंश मिला।
ज्यादातर स्त्रियां एक ऐसी दुनिया में सीमित रह गई हैं, जहां शरीर से परे कुछ नहीं। वजह, दूसरों और खासकर पुरुषों की नजर से खुद को आंकना। लुक्स या बोलचाल मायने रखता है लेकिन कहीं कुछ गड़बड़ है अगर आप खुद को एस्थेटिकली चैंलेंज्ड मानते हुए बदलाव की 'जरूरत" महसूस करती हैं। मोटापा कम होना चाहिए, अगर वो आपके स्वास्थ्य पर भारी पड़े। अपीयरेंस में बदलाव सही है अगर 'आप" इससे नाखुश हैं। आप ठंडी करार दी जाती हैं तो ये आपकी असफलता नहीं और न ही हॉट होना आपके फेवर में है। खुद को स्वीकारना स्त्री-स्वातंत्र्य की दिशा में पहला कदम होगा।

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