Wednesday, 28 December 2016

क्यों नहीं कह सकती कि ख़ुदकुशी भी एक विकल्प है मेरे पास.
इसमें भी लगती है मेहनत, चाहिए इसमें भी बड़ा जिगर, बड़ा हुनर,
कि लोग ये न कहें कि जानकर इतना ही ज़हर पिया कि बच जाए.
पेनकिलर या एनेस्थिशिया नहीं, बस, कोशिश करनी होगी एक सहनीय मौत की.
जगह भी माफ़िक चुननी होगी,
वहां जहां धूल न हो, मरते वक्त नाक में सुरसुराहट भला किसे मुफ़ीद होगी.
वहां भी नहीं जहां रेल की पटरी हो, या हो बबूल का पेड़
मुझे चाहिए हरियाली, कुछ खुशनुमा चेहरे.
और हां, वो दिन भी कुछ ख़ास होना चाहिए
चमकीले सूरज वाला, ख़ुशरंग
और कोई ऐसी तारीख़ जिसके आसपास कोई त्योहार-बार न पड़ता हो
नहीं गवारा मुझे पांच सालों तक घर का सूना पंचांग और सूखी रसोई.
ओह हां, लगन भी चाहिए मरने की प्लानिंग में कि कहीं कोई जान न ले
अपने सबसे करीबी को भी दूर रखना होगा इस साजिश से,
ऐसा न हो कि मरने के बाद सब उसे ही मान लें ज़िम्मेदार अंजाम का.
नहीं, ख़ुदकुशी किसी कायर के बस का नहीं.
कितनी हिम्मत चाहिए इससे लिए, कितना दिमाग
कि हर कुछ ठोंकना-बजाना होता है मौत से पहले.
अपने अधूरे कामों पर ताला लगाना होता है.
करनी होती है कितने ही सपनों की हत्या, आत्महत्या के पहले
औऱ इन सबसे ऊपर,
मानना होता है कि कोशिशों से परे हैं अब हालात
जल्लाद बनकर अनदेखा करना अपनी मौत के बाद के हालातों को किसी कायर का बूता नहीं.
बंद करनी होगी उम्मीद की हर किरण कि कहीं कोई ख़बर, कोई ख़ुशी मुझे थोड़े वक़्त को भरमा न दे.
जानती हूं मौत भी एक विकल्प है हर ज़िंदा आदमी के लिए, बस बूते का नहीं हरेक के.

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