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Saturday, 16 February 2013

थोड़े की ज़रूरत है


हर बार पहली दफे होता है जब तुझे सोचती हूं,
अपने अनंत शून्य को भरने का यही तरीका मुफीद पड़ा मुझे।
बेढब सी कल्पना में तुम बराबर साथ उड़ते हो कल्पनाओं के पंख लगाकर
खुरदुरी ज़मीन से शुरु कर लांघ जाते हैं हम सातों समुंदर दूरियों के
छूते हैं चौदहवों आसमान सपनों के।
क्या ही स्वाद है इस ख़याली पुलाव का कि महक मुझे हकीकत में भी तुझसे बांधे रखती है।

Thursday, 14 February 2013

हमारा मिलना


बड़ी दूर थे हम जब पहली बार तुम्हारी आंखों ने मुझे छुआ।
कोई जलजला नहीं आया था।
हमारे बदन के ताप से न ग्लेशियर पिघले, न फूल झूमे,
बस, मेरे भीतर का मोम गलकर कहीं बालों में अटक गया होगा।
मुलाकातियों की नजरें टोहभरी और मुस्कानें गहरा गई थीं।
बार-बार बालों को झटकारती, गालों-होंठों-गरदन पर हाथ फिराती रही मैं,
शायाद कुछ था जो त्वचा के कहीं भीतर उतर गया था,
हिंदुस्तानी, यूनानी नुस्खों की जद से परे।
हम फिर मिले, दोबारा, पहली बार।
जाड़ों का वक्त,
अपने साथ ढेर सी सर्दी लेकर आई मैं
और तुम्हारी ढेर सी गर्मी को अपने भीतर उतार लिया।
पास ही जासूसी करते धूप के एक टुकड़े को धीरे से चूमकर मैंने होंठ तुमपर धर दिए।
बिना चूके तुमने जो एक चुगलखोर तितली बरामद की थी न
मेरे दिल में कैद आज भी वो उस दिन की दुहाई देती है।
सुना है, तुम्हारे भीतर छिपी धूप दुबरा गई है!

Friday, 1 February 2013

आंसू


आंसू कभी नहीं सूखते.
वो भेदते हैं त्वचा का झीना आवरण और समा जाते हैं शरीर के भीतर,
दौड़ते हैं खून के साथ नसों-औ-शिराओं में.
दिलो-दिमाग से गुज़रकर
जज़्ब हो जाते हैं आत्मा में
शायद इसलिए आत्मा कभी नहीं मरती.